परिचय

दिगम्बराचार्य श्री सौरभ सागर जी महामुनिराज

दिगम्बराचार्य श्री सौरभ सागर जी महामुनिराज

बालक सुरेंद्र से आचार्य श्री सौरभसागर की यात्रा

जिनधर्म गगन के देदीप्यमान सूर्य, परम पूज्य आचार्य श्री 108 सौरभसागर जी मुनिराज अपनी वीतरागी साधना, संयम, तप, ध्यान, ज्ञान एवं गंभीरता की उज्ज्वल किरणावली से संसार के भव्य जीवों के जीवन-कमल को खिला रहे हैं।

छत्तीसगढ़ के जसपुर नगर में पिता श्री श्रीपाल जी एवं माता श्रीमती चन्द्रप्रभा जी के यहाँ सात भाइयों एवं चार बहनों के परिवार में एक भव्यात्मा के रूप में बालक सुरेन्द्र का जन्म 22 अक्टूबर 1970 को हुआ।

बाल्यकाल से ही पूर्वजन्म के संस्कारों एवं जिनसाधना के पुण्य प्रभाव से उनका जीवन सुसंस्कारों से परिपूर्ण रहा। मात्र 12 वर्ष की आयु में आचार्य श्री पुष्पदंत सागर जी महामुनिराज के मुखारविंद से उच्चारित *रत्नकरण्ड श्रावकाचार* के मंगलाचरण को सुनकर बालक सुरेन्द्र के जीवन में वैराग्य का भाव जागृत हुआ।

8 अप्रैल 1983 को उन्होंने गृहत्याग कर आचार्य श्री पुष्पदंत सागर जी मुनिराज के साथ स्व-पर कल्याण के पथ पर कदम बढ़ाया। नन्हे-नन्हे पैरों से परीषहों पर विजय प्राप्त करते हुए वे मुक्ति के मार्ग पर निरंतर आगे बढ़ने लगे।

देह से छोटे, किंतु कुशाग्र बुद्धि, स्थिरता एवं प्रज्ञा से बड़े-बड़े ज्ञानी और तपस्वियों के समतुल्य बाल ब्रह्मचारी ने शुक्रवार, 17 जनवरी 1986 को, छत्तरपुर (म.प्र.) में क्षुल्लक दीक्षा एवं सोमवार, 27 जून 1988 को, अंदेश्वर पार्श्वनाथ (राज.) में ऐलक दीक्षा ग्रहण कीं।। स्वाध्याय, निज-चिंतन एवं साधना में निरंतर लीन रहते हुए उन्होंने अपने जीवन को आध्यात्मिक उन्नति की ओर अग्रसर किया।

आचार्य श्री पुष्पदंत सागर जी ने 21 सितम्बर 1994 को इटावा (उत्तर प्रदेश) में उन्हें जैनश्वरी दीक्षा प्रदान की। इस प्रकार मुनिराज श्री सौरभसागर जी दिगम्बर साधु परमेष्ठी पद पर प्रतिष्ठित हुए। इसके पश्चात नगर-नगर विहार करते हुए उन्होंने जिनधर्म, नैतिक आचरण, सेवा, प्रेम, कर्तव्य एवं ज्ञान के संस्कारों का बीजारोपण किया और समाज में धर्म के प्रति जागृति उत्पन्न की।

अपने वात्सल्य, उत्कृष्ट ज्ञान एवं गंभीर मुद्रा से सभी के हृदय में श्रद्धा का स्थान बनाने वाले पूज्य गुरुदेव को आचार्य श्री पुष्पदंत सागर जी ने 10 अप्रैल 2022 को पुष्पगिरि तीर्थ पर सैकड़ों श्रद्धालुओं की साक्षी में आचार्य पद पर प्रतिष्ठित किया। यह अद्भुत संस्कार एवं गुरु-शिष्य परंपरा का दर्शन युगों तक स्मरणीय रहेगा।

गुरुदेव की साधना एवं सेवा कार्य

आचार्य श्री सौरभसागर जी गुरुदेव ने साधना के अल्प काल एवं अल्पायु में ही अपने वात्सल्यपूर्ण एवं प्रेरक प्रवचनों द्वारा समाज को अनेक कार्यों के लिए प्रेरित किया। सेवा, शिक्षा एवं संस्कृति के क्षेत्र में उनके प्रयासों से अनेक अद्भुत कार्य स्थापित हुए।

दिगम्बराचार्य श्री सौरभ सागर जी महामुनिराज

आचार्य श्री ने समाज को जागरूक करने हेतु जेलों में भी प्रवचन दिए- बांदा, शिवपुरी , आगरा अलीगढ़ की जेल में उन्होंने 1600 से अधिक कैदियों को मांसाहार,अंडा,शराब जैसे दुर्व्यसनों से मुक्त कराया। इसी प्रकार अनेक विद्यालयों में उनके प्रेरक संदेशों से शिक्षक एवं विद्यार्थी प्रभावित हुए तथा उन्होंने खान-पान एवं जीवनशैली से संबंधित अनेक त्याग के संकल्प ग्रहण किए। नई पीढ़ी को संस्कारों से जोड़ने के लिए गुरुदेव का योगदान सदैव स्मरणीय रहेगा।

गुरुदेव की प्रेरणा से हरियाणा के गन्नौर में स्थित **सौरभांचल तीर्थ** अपनी भव्यता एवं आध्यात्मिक वातावरण के कारण समवशरण की रचना का आभास कराता है। यहाँ ताम्रपत्रों पर जिनवाणी की रचना एवं प्रस्तुति विशेष आकर्षण का केंद्र है।

हिसार की नसियाँ से गुरुदेव के ज्ञान-ध्यान-योग के प्रभाव से प्रकट हुई त्रिमूर्तियाँ भी उनके ज्ञानयोगी व्यक्तित्व को सुशोभित करती हैं।

गुरुदेव की ज्ञान-लेखनी एवं साहित्यिक योगदान

गुरुदेव के ज्ञान, ध्यान एवं प्रवचनों से प्रेरित होकर हजारों शिविरार्थी विभिन्न धार्मिक शिविरों का लाभ लेते हैं। उनके समवशरण में महावीर प्रभु की देशना के भावों को सुनने और समझने का अवसर प्राप्त होता है।

जैन हों अथवा अजैन—गुरुदेव के चरणों में सभी को श्रद्धा और मार्गदर्शन का आश्रय प्राप्त होता है। अपनी आयु से भी अधिक जिनमंदिरों एवं पंचकल्याणक प्रतिष्ठाओं के निर्माण और धार्मिक जागृति के कार्यों में गुरुदेव की प्रेरणा का महत्वपूर्ण योगदान रहा है।

-- लेखिका : श्रीमती रेनू जैन (सूरजमल विहार)